उद्भ्रांत जी का महाकाव्य "त्रेता: एक सम्यक विवेचन"

गल्प

विश्व परिप्रेक्ष्य में रामायण

त्रेता की समयावधि

दूसरा सर्ग- रेणुका

तीसरा सर्ग-भवानी

चौथा सर्ग –अनुसूया

पाँचवाँ सर्ग- कौशल्या

छठा सर्ग-सुमित्रा

सातवाँ सर्ग-कैकेयी

ताड़का आठवाँ सर्ग

नौवां सर्ग- अहिल्या

दसवाँ सर्ग- मंथरा

ग्यारहवाँ सर्ग- श्रुति कीर्ति

बारहवाँ सर्ग- उर्मिला

तेरहवा सर्ग - माण्डवी

चौदहवाँ सर्ग- शान्ता

पंद्रहवाँ सर्ग- सीता

सोलहवाँ सर्ग- शबरी

सत्रहवाँ सर्ग- सूर्पणखा

अठारहवाँ सर्ग- तारा

उन्नीसवाँ सर्ग- सुरसा

बीसवाँ सर्ग- लंकिनी

इक्कीसवाँ सर्ग- त्रिजटा

बाईसवाँ सर्ग- मन्दोदरी

तेइसवाँ सर्ग- सुलोचना

चौबीसवाँ सर्ग- धोबिन

पच्चीसवाँ सर्ग - मैं जननी शम्बूक की

छब्बीसवाँ सर्ग- उपसंहार - कलि

विश्व परिप्रेक्ष्य में रामायण

Published On 22-07-2017

पारंपरिक आस्थाओं के अनुसार जितनी रामायणों के बारे में हमें जानकारी है, सब एक दूसरे की या तो पूरक है या फिर एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। अगर हम ध्यानपूर्वक अपने शास्त्रों का अध्ययन करते हैं तो यह पाते हैं कि अलग-अलग रामायणों में अलग-अलग कथानकों, वृतांतों अथवा दृष्टांतों का उल्लेख मिलता है।भगवान शिव ने जिस रामायण का वर्णन किया है,उसमें सौ हज़ार श्लोक हैं।हनुमान के रामायण में साठ हज़ार, वाल्मीकि के रामायण में चौबीस हज़ार और दूसरे कवियों ने इससे कम श्लोकों के रामायणों की रचना की हैं। अकादमिक विज्ञान वर्ग वाले अधिकांश रामायण को रामकथा अर्थात् राम की अनौपचारिक कहानी मानते हैं, जबकि एक कवि अथवा लेखक द्वारा औपचारिक रूप से लिखे गए कथानकों पर बहुत कम ध्यान देते हैं। जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि बहुत सारी रामकथाएँ या रामायण ऐसी हैं, जो एक दूसरे को कुछ हद तक प्रभावित करती हैं। विगत दो शताब्दियों से यूरोप और अमेरिकन स्कॉलर रामायण पर शोधात्मक अध्ययन अलग-अलग तरीके से कर रहे हैं। दुर्लभ रामायणों के अनुवादों का संग्रह कर रहे हैं ताकि रामायण के सुनिश्चित नतीजों को सर्वसुलभ कराया जा सके।जहाँ यूरोपियन स्कॉलर रामायण को नस्लवाद के रूप से देखते हुए औपनिवेशिक काल में शासक के दृष्टिकोण पर ध्यानाकर्षण करते हैं, जैसे आर्य बनाम द्रविड़, उत्तर बनाम दक्षिण, वैष्णव बनाम शैव, पुजारी बनाम राजा आदि, वैसे अमेरिकी विचारक औपनिवेशिक काल के बाद रक्षक की दृष्टि से देखते हुए रामायण के मुख्य कारक जैसे लिंग-भेद अथवा जातीय-संघर्ष, जिसकी वजह से मनुष्य एक राक्षस बनने पर किस तरह आमादा हो जाता है, उन कारणों का विश्लेषण करने के साथ-साथ सामंतवादी शब्दों में अगर कहा जाए तो भक्ति का रूप देखते हैं, जबकि भारतीय शोधार्थी अपने नायकों और देवताओं को न्याय-संगत बताने के चक्कर में प्रतिरक्षात्मक रवैये को अपनाने का प्रयास करते हैं। यही नहीं, आधुनिक स्कॉलर रामायण का सटीक वर्गीकरण करने में भी अपने आपको अक्षम पाते हैं, क्या रामायण वास्तव में ऐतिहासिक ग्रंथ है (जैसाकि दक्षिणपंथी स्कॉलर मानते हैं)? क्या यह समाज के लिए उठाया गया साहित्यिक प्रोपेगंडा है (जैसा कि वामपंथी विचारक मानते हैं)? इसके अलावा, क्या वास्तव में यह भगवान की कहानी हैं, जिसे भक्तगण मानते हैं? क्या केवल मानवीय मस्तिष्क का कपोल कल्पित खाका है, जिससे आदर्श मानवीय व्यवहार को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया गया है? रामायण की अनेक गाथाओं का विश्लेषण करने पर तीन महत्वपूर्ण दृष्टिकोण सामने आते हैं :-
1) पहला- आधुनिक दृष्टिकोण – जिसके अनुसार वाल्मीकि की संस्कृत में लिखी रामायण मान्यता प्राप्त है।
2) दूसरा-आधुनिकोत्तर दृष्टिकोण– जिसके अनुसार सभी रामायणों की मान्यता बराबर बराबर है।
3) तीसरा-आधुनिकोत्तरोत्तर दृष्टिकोण – इस दृष्टिकोण के अनुसार विश्वास करने वाले के दृष्टिकोण का स्वागत होना चाहिए।
कुछ आलोचक भारतीय मानसिकता पर हजारों सालों से असर डालने वाली इस महाकथा को असंगत (इररेशनल) मानते हैं, जबकि आधुनिक शिक्षा का उद्देश्य समाज को संगत (रेशनल) बनाना है। सन् 1987 में रामानंद सागर द्वारा निर्मित ‘रामायण’ पर आधारित सीरियल को जब प्रत्येक रविवार की सुबह दिखाया जाता था तो समूचा देश उस समय के लिए जड़-सा हो जाता था। जहाँ राम जन्मभूमि विवाद ने राष्ट्र के पंथ-निरपेक्ष हृदय को पूरी तरह से कुचल दिया था, वहीं 2013 में इसे भारतीय औरतों की दयनीय अवस्था का प्रमुख कारण माना। इतना होने पर इस महाकाव्य को आधार बनाकर राजनेताओं द्वारा फायदा उठाने, नारीवादी लेखक-लेखिकाओं द्वारा आलोचनात्मक तथ्य खोजने और एकेडेमीशियन द्वारा विखण्डित (deconstructed) मानने के बावजूद भी आज भी लाखों लोगों में आशा व आनंद संचरण करने का स्रोत माना जाता है।
रामायण के साहित्य का चार कालों में अध्ययन किया जा सकता है। पहला काल दूसरी शताब्दी तक का वह है, जब वाल्मीकि रामायण का अंतिम रूप लगभग तैयार हो गया था। दूसरा काल (दूसरी शताब्दी से लेकर दसवीं शताब्दी तक) का है, जब संस्कृत, प्राकृत भाषाओं में अनेकानेक नाटकों तथा कविताओं की रचना हुई। इस काल में बौद्ध तथा जैन परंपराओं में भी राम को खोजने का प्रयास कर सकते हैं, मगर पौराणिक साहित्य में राम को विष्णु के रूप में देखा जा सकता है। तीसरा काल दसवीं शताब्दी के बाद का है, जब इस्लाम के बढ़ते वर्चस्व के खिलाफ रामायण जन-सामान्य की जुबान का ग्रंथ बन गया। इस काल में ‘रामायण’ ज्यादा भक्तिपरक नजर आया, जिसमें राम को भगवान तथा हनुमान को सबसे प्रिय भक्त एवं दास बताया गया। अंत में, चौथे काल में उन्नीसवीं शताब्दी से रामायण यूरोपियन एवं अमेरिकन दृष्टिकोण से बहुत ज्यादा प्रभावित होने लगी और आधुनिक राजनैतिक व्यवस्थाओं के आधार पर उचित न्याय पाने के लिए रामायण में Deconstruction, Reimagination तथा decoding शुरू हो गई।
ईसा पूर्व (500 बी.सी से लेकर 200 बी.सी तक) रामकथा मौखिक रूप से यात्रा करती रही है और बाद में संस्कृत भाषा के अंतिम रूप में रची गई। जिसे लेखन का रूप दिया वाल्मीकि ने, और जिसे आदि काव्य अर्थात् पारम्परिक तौर पर प्रथम कविता के रूप में गिना जाता है। परवर्ती सारे कवि वाल्मीकि को राम की कविता का जनक मानते है। वाल्मीकि के इस कार्य को यायावर (घुमक्कड़) जातियों ने चारों तरफ फैलाया। मौलिक कार्य में मुख्य दो कार्य संग्रह प्राप्त होते हैं, पहला उत्तर और दूसरा दक्षिण। पहले सात अध्यायों में राम का बचपन और अंतिम अध्यायों में राम द्वारा सीता का परित्याग दर्शाया गया है। तत्कालीन ब्राह्मणों ने इस कथा को संस्कृत में लिखने का घोर विरोध किया, मगर मौखिक परंपरा (श्रुति) को जारी रखा, जबकि बौद्ध और जैन स्कॉलरों ने मौखिक शब्दों की तुलना में लिखना ज्यादा पसंद किया। जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि पाली और प्राकृत भाषा में पहली बार रामकथा का उल्लेख मिलता है। प्रांतीय रामायणों की रचना की शुरुआत दसवीं सदी के बाद होती है। सबसे पहले दक्षिण भारत में बारहवीं सदी में, फिर पूर्वी भारत में पंद्रह सदी में तथा बाद में 16वीं शताब्दी में उत्तर भारत में प्रांतीय रामायणों की रचना हुई। महिलाओं की अधिकांश रामायण मौखिक होती थी। उनका मुख्य उद्देश्य घरेलू परंपराओं तथा अन्य पर्वों पर आधारित गानों में प्रयोग करना होता था। यद्यपि यह बात भी सही है, सोलहवीं शताब्दी में दो महिलाओं ने रामायण लिखी, तेलुगु में मोआ तथा बंगाली में चंद्रावती ने। रामायण लिखने वाले अधिकांश पुरुष लेखक अलग-अलग गतिविधियों से संबंध रखते थे। बुद्ध रेड्डी (जमींदार घर से), बलराम दास और सारला दास (पिछड़ी जाति से) तथा कंबन मंदिर में संगीत बजाने वाली जातियों से संपृक्त थे। सोलहवीं शताब्दी में मुगल सम्राट अकबर ने अपनी जनता की संस्कृति का ध्यान रखते हुए रामायण का अनुवाद संस्कृत से पर्सियन में करने का आदेश दिया तथा चित्रकारों को इस महाकाव्य को पर्सियन तकनीकी का प्रयोग करते हुए रेखांकित करने का भी हुकमनामा जारी किया। रामायण के ये सारे चित्र राजस्थान, पंजाब, हिमाचल प्रदेश के राजाओं के महलों की नक्काशी में आसानी से देखे जा सकते हैं।
भारत में आज भी अनेक गाँव और ऐसे कस्बे हैं, जो रामायण कालीन घटनाओं की याद दिलाते हैं। उदाहरण के तौर पर मुंबई का ‘बाण गंगा तालाब’ राम के बाण से खुदा हुआ तालाब माना जाता है। भारत में अधिकांश अवसरों पर राम के गीत गाए जाते हैं, कहानियाँ सुनी-सुनायी जाती हैं, नाटकों का प्रदर्शन किया जाता है, अथवा कपड़ों की पेंटिंग या मंदिर की दीवारों पर भास्कर्य के रूप में त्रेताकालीन घटनाओं का ब्यौरा प्रस्तुत किया जाता है अथवा उन घटनाओं का वाचन भी किया जाता है। प्रत्येक कला का अपना अलग-अलग महत्व होता है। आज के उत्तरप्रदेश के देवगढ़ मंदिर के गुप्त साम्राज्य के दौरान सोलहवीं शताब्दी के आस-पास के समय की राम की iconography भी मिलती है, जिनमें राम को विष्णु के मानव- अवतार के रूप में दिखाया गया है। सत्रहवीं शताब्दी में पहली बार तमिलनाडु के अलावर भक्तों ने राम से संबंधित भक्ति गीतों की रचना की। जैसा कि यह सर्व विदित है, बारहवीं शताब्दी में भक्ति के ज्ञान के द्वारा जन सामान्य के लिए पूरी तरह से खोले गए थे और संस्कृत कमेंटरी के रूप में वेदान्त दर्शन के अनुरूप राम भक्ति को विशिष्ट स्थान प्रदान किया गया। चौदहवीं शताब्दी में उत्तर भारत में रामानन्द ने रामभक्ति का प्रचार-प्रसार किया और सत्रहवीं शताब्दी में रामदास ने इस कार्य को पूर्ण किया। रामानुज (राम का छोटा भाई), रामानंद (राम का आनंद) और रामदास (राम का दास यानि नौकर) आदि नामकारणों में राम का महत्व स्वतः उजागर हो जाता है। राम के नाम का महत्व हमारे देश की सीमाओं को तोड़कर अंतरराष्ट्रीय धरातल पर भी छाने लगा था। जहाँ तिब्बत के विद्वानों ने आठवीं शताब्दी में रामायण की कहानियों की रिकॉर्डिंग का काम किया, वहीं पूर्व में मंगोलिया तथा पश्चिम के मध्य एशिया के खोतान में भी यह ट्रेंड देखने को मिलता है। इस तरह राम की यह कहानी भारतीय उप महाद्वीप से बाहर निकलकर विश्व-व्यापी होने लगी और देखते-देखते दक्षिण पश्चिम एशिया के अनेक भू-भागों में अत्यंत ही प्रभावोत्पादक ढंग से तत्कालीन मसालों और फेब्रिक्स के व्यापारियों द्वारा एशिया में फैली। जहाँ भारत के इस भक्ति आंदोलन के तत्वों का पूर्णतया अभाव था। जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह प्रसार 10वीं शताब्दी के पूर्व में हुआ। लाओस की रामायण बौद्ध धर्म से संपृक्त है, मगर थाईलैंड की थाई रामायण (रामकियन) हिन्दू प्रतीत होती है, भले ही, वह बैंकाक के एमराल्ड बौद्ध मंदिर के प्राचीरों पर अंकित क्यों न हो। 14वीं से 18 वीं शताब्दी में थाई साम्राज्य (जब तक यह नष्ट नहीं हो गया) था, राजधानी ययुध्या(अयोध्या) के नाम से विख्यात थी और उनके राजाओं के नाम राम के आधार पर पाए जाते थे। इसी तरह दक्षिण पश्चिमी एशियाई देशों में इण्डोनेशिया और मलेशिया की सांस्कृतिक विरासत में भी इस्लाम के प्रादुर्भाव होने के बाद भी रामायण उसका हिस्सा बना रहा। आज भी उनकी रामायण की कहानियों में रावण के नाश करने की कहानियाँ मिलती हैं। यहाँ तक कि भारत की प्रांतीय भाषाओं में भी रामायण के अनुवाद अथवा पुनः सृजन देखने को मिलता है। उदाहरण के तौर पर तमिल में कंबन, मराठी में एकनाथ, ओड़िया में बलराम दास की दांडी रामायण, सारला दास का विलंका रामायण, उपेन्द्र भंज की वैदेहीश विलास तथा विश्वनाथ खुंटिया के विचित्र रामायण आदि के अनेकानेक संस्करण देखने को मिलते हैं। अगर रामायण की रचना अवधि पर प्रकाश डाला जाए तो हमें सबसे पहले ईसा पूर्व 200 साल की तरफ देखना होगा, जब यायावरों द्वारा इस कथा का मौखिक गायन होता था, फिर वाल्मीकि ने संस्कृत भाषा में इसे लिपिबद्ध किया और उसके बाद सन् 100 से सन् 300 के बीच वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत में रामोपाख्यान, भाषा का संस्कृत में प्रतिमा नाटक, संस्कृत में विष्णु पुराण, प्राकृत भाषा में विमल सूरी का पाउम् चरियम, कालिदास रचित रघुवंशम् देखने को मिलते है। यही कथा सन् 500 से सन् 1000 के मध्य बौद्ध धर्म का ‘दशरथ जातक’, देवगढ़ मंदिर की दीवारों पर राम के चित्र, भवभूति का संस्कृत नाटक ‘महावीर चरित’, मुरारी के संस्कृत नाटक ‘अनर्गराघव’, सन् 1100 से सन् 1500 के मध्य राजा भोज द्वारा रचित ‘चंपू रामायण’, कम्बन की तमिल इरामावतारम, बुद्धा रेड्डी की तेलुगु 'रंगनाथ रामायण', कृतिवास का बंगला रामायण, कण्डाली का आसामी रामायण, बलरामदास का ओड़िआ दांडी रामायण के अतिरिक्त संस्कृत भाषा के आनंद रामायण, अवधूत रामायण व अध्यात्मिक रामायण प्रमुख हैं। सन् 1600 से 2000 के बीच तुलसीदास की अवधी रामायण, रामायण की पेंटिंगों का अकबर द्वारा संग्रह, एकनाथ का मराठी ‘भावार्थ रामायण’, तोरावेद का कन्नड रामायण, एजुयाचन की मलयालम रामायण, गुरुगोविंद सिंह का पंजाबी ‘गोविंद रामायण’ (दशम ग्रंथ का एक हिस्सा), गिरिधर का गुजराती रामायण, द्वारिका प्रकाश का कश्मीरी रामायण, भानुभक्त के नेपाली रामायण के अतिरिक्त सन् 1921 में हिन्दी में सती सुलोचना पर मूक फिल्म, सन् 1943 में फिल्म ‘रामायण’ (महात्मा गांधी द्वारा देखी गई एक मात्र फिल्म), सन् 1955 में रेडियो पर मराठी में गीत रामायण, 1970 में अमर कथाचित्र पर राम के कॉमिक्स, सन् 1987 में फिल्म निदेशक रामानन्द सागर का रामायण पर धारावाहिक तथा सन् 2003 में अशोक बेंकर द्वारा लिया गए उपन्यासों की शृंखला ने राम की इस कथा को और आगे बढ़ाया।

भिन्न-भिन्न प्रकार से गिनने पर रामायण तीन सौ से लेकर एक हजार तक की संख्या में विविध रूपों में मिलता है। इनमें से संस्कृत में रचित वाल्मीकि रामायण (आर्ष रामायण) सबसे प्राचीन माना जाता है।साहित्य शोध भगवान राम के बारे में अधिकारिक रूप से जानने का मूल स्रोत महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण है। इस गौरव ग्रंथ के कारण वाल्मीकि दुनिया के आदि कवि माने जाते हैं। श्रीराम कथा केवल वाल्मीकि रामायण तक सीमित न रही बल्कि मुनि व्यास रचित महाभारत में भी चार स्थलों- रामोपाख्यान, आरण्यकपर्व, द्रोण पर्व तथा शांतिपर्व-पर वर्णित है। बौद्ध परंपरा में श्रीराम संबंधित दशरथ जातक, अनामक जातक तथा दशरथ कथानक नामक तीन जातक कथाएं उपलब्ध हैं। रामायण से थोडा भिन्न होते हुए भी वे इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ हैं। जैन साहित्य में राम कथा संबंधी कई ग्रंथ लिखे गए, जिनमें मुख्य हैं- विमलसूरि कृत पदमचरित्र(प्राकृत), रविषेणाचार्य कृत पद्म पुराण (संस्कृत), स्वयंभू कृत पदमचरित्र (अपभ्रंश), रामचंद्र चरित्र पुराण तथा गुणभद्र कृत उत्तर पुराण (संस्कृत)। जैन परंपरा के अनुसार राम का मूल नाम 'पदम' था। दूसरे, अनेक भारतीय भाषाओं में भी राम कथा लिखी गई। हिंदी में कम से कम 11, मराठी में 8, बंगला में 25,
तमिल में 12, तेलुगु में 12 तथा उडिया में 6 रामायणें मिलती हैं। हिंदी में लिखित गोस्वामी तुलसीदास कृत
रामचरित मानस ने उत्तर भारत में विशेष स्थान पाया। इसके अतिरिक्त भी संस्कृत,गुजराती, मलयालम,
कन्नड, असमिया, उर्दू, अरबी, फारसीआदि भाषाओं में राम कथा लिखी गई। महाकवि कालिदास, भास, भट्ट,
प्रवरसेन, क्षेमेन्द्र, भवभूति, राजशेखर,कुमारदास, विश्वनाथ, सोमदेव, गुणादत्त, नारद, लोमेश, मैथिलीशरण गुप्त,
केशवदास, गुरु गोविंद सिंह, समर्थगुरु रामदास,संत तुकडोजी महाराज आदि चार सौ से अधिक कवियों ने,
संतों ने अलग-अलग भाषाओं में राम तथा रामायण के दूसरे पात्रों के बारे में काव्यों/कविताओं की रचना की है।
धर्मसम्राट स्वामी करपात्री ने रामायण मीमांसा की रचना करके उसमें रामगाथा को एक वैज्ञानिक आयामाधारित

विवेचन दिया। वर्तमान में प्रचलित बहुत से राम कथानकों में आर्ष रामायण, अद्भुत रामायण, कृत्तिवास रामायण,

बिलंका रामायण,मैथिल रामायण, सर्वार्थ रामायण, तत्वार्थ रामायण, प्रेम रामायण, संजीवनी रामायण, उत्तर रामचरितम्, रघुवंशम्,

प्रतिमानाटकम्, कम्ब रामायण, भुशुण्डि रामायण, अध्यात्म रामायण, राधेश्याम रामायण, श्रीराघवेंद्रचरितम्,

मन्त्र रामायण, योगवाशिष्ठ रामायण, हनुमन्नाटकम्, आनंद रामायण, अभिषेकनाटकम्, जानकीहरणम् आदि मुख्य हैं।

विदेशों भी तिब्बती रामायण, पूर्वी तुर्किस्तानकी खोतानीरामायण, इंडोनेशिया की ककबिनरामायण, जावा का

सेरतराम, सैरीराम, रामकेलिंग, पातानीरामकथा, इण्डोचायनाकी रामकेर्ति (रामकीर्ति), खमैररामायण, बर्मा (म्यांम्मार) की

यूतोकी रामयागन, थाईलैंड की रामकियेनआदि रामचरित्र का बखूबी बखान करती है। इसके अलावा विद्वानों का

ऐसा भी मानना है कि ग्रीस के कवि होमर का प्राचीन काव्य इलियड, रोम के कवि नोनस की कृति डायोनीशिया तथा

रामायण की कथा में अद्भुत समानता है।विश्व साहित्य में इतने विशाल एवं विस्तृत रूप से विभिन्न देशों में विभिन्न कवियों/लेखकों द्वारा राम के अलावा

किसी और चरित्र का इतनी श्रद्धा से वर्णन न किया गया।


संस्कृत

वाल्मीकि रामायण - वाल्मीकि

योगवासिष्ठ या 'वशिष्ठ रामायण' - वाल्मीकि

अध्यात्म रामायण - वेद व्यास

आनन्द रामायण - वाल्मीकि

अगस्त्य रामायण - वाल्मीकि

अद्भुत रामायण - वाल्मीकि

रघुवंश- कालिदास

हिन्दी

रामचरितमानस - हिन्दी (अवधी)

राधेश्याम रामायण-हिन्दी
रामचंद्रिका-केशवदास
साकेत-मैथिली शरण गुप्त

पउमचरिउ (जैनरामायण) - अपभ्रंश (विमलसूरि कृत)

ओड़िया

जगमोहन रामायण या दाण्डि रामायण या ओड़िआ रामायण : बळराम दास

बिशि रामायण: बिश्वनाथ खुण्टिआ

सुचित्र रामायण : हरिहर

कृष्ण रामायण : कृष्ण चरण पट्टनायक

केशब रामायण : केशब पट्टनायक

रामचन्द्र बिहार : चिन्तामणी

रघुनाथ बिळास : धनञ्जय भञ्ज

बैदेहीशबिळास : उपेन्द्र भञ्ज

नृसिंह पुराण : पीताम्बर दास

रामरसामृत सिन्धु : काह्नु दास

रामरसामृत : राम दास

रामलीळा : पीताम्बर राजेन्द्र

बाळ रामायण : बळराम दास

बिलंका रामायण : भक्त कवि शारलादास

तेलुगु

भास्कर रामायण

रंगनाथ रामायण

रघुनाथ रामायणम्

भास्कर रामायण

भोल्ल रामायण

कन्नड

कुमुदेन्दु रामायण

तोरवे रामायण

रामचन्द्र चरित पुराण

बत्तलेश्वर रामायण

कथा रामायण – असमिया

कृत्तिवास रामायण – बांग्ला

भावार्थ रामायण - मराठी

राम बालकिया – गुजराती

रामावतार या गोबिन्द रामायण - पंजाबी (गुरु गोबिन्द सिंह द्वारा रचित)

रामावतार चरित – कश्मीरी

रामचरितम् – मलयालम

रामावतारम् या कंबरामायण - तमिल

मन्त्र रामायण-

गिरिधर रामायण

चम्पू रामायण

आर्ष रामायण या आर्प रामायण

अनामक जातक - बौद्ध परंपरा

दशरथ जातक - बौद्ध परंपरा

दशरथ कथानक - बौद्ध परंपरा

रामायण - मैथिली (चन्दा झा)

नेपाली

भानुभक्तकृत रामायण

सुन्दरानन्द रामायण

आदर्श राघव

नेपालभाषा : सिद्धिदास महाजु

कंबोडिया : रामकर

तिब्बती रामायण

पूर्वी तुर्किस्तान : खोतानीरामायण

इंडोनेशिया : ककबिनरामायण

जावा : सेरतराम, सैरीराम, रामकेलिंग, पातानीरामकथा,

इण्डोचायना : रामकेर्ति (रामकीर्ति), खमैररामायण

बर्मा (म्यांम्मार) : यूतोकी रामयागन

थाईलैंड : रामकियेन

सन् 2007 में उद्भ्रांत जी राम कथा का रूपांतरित संस्करण ‘त्रेता’ (महाकाव्य) के रूप में नेशनल पब्लिशिंग हाऊस, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुआ। समय की मांग के अनुरूप त्रेता युगीन राम राज्य की महिलाओं पर महाकाव्य को अलग रूप से प्रतिपादित कर उद्भ्रांत जी ने महिला विमर्श पर आधुनिक दृष्टिकोण डालते हुए भवानी, अनसूया, कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी, ताड़का, अहिल्या, मंथरा, श्रुतकीर्ति, उर्मिला, मांडवी, शांता, सीता, शबरी, शूर्पनखा, तारा, सुरसा, लंकिनी, त्रिजटा, मंदोदरी, सुलोचना, धोबिन, शंबूक की जननी आदि का एक ही कैनवास पर चित्र उकेर कर तत्कालीन सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और आध्यात्मिक चेतना के स्वरों में महिलाओं की भूमिका पर इस तरह निरपेक्ष भाव से दृष्टि डाली है कि सही अर्थ तक पहुँचने के लिए आपको इस महाकाव्य को अनेक बार पढ़ना होगा। क्योंकि कवि ने मिथकीय चरित्रों में कई बार मानवीय गुणों को खोजने की भरसक चेष्टा की है। सोने के हिरण के प्रति सीता की लालसा, हनुमान का उड़कर नहीं ‘वरन तैरकर समुद्र पार करना, कैकेयी पर दशरथ का आसक्त होने के अतिरिक्त शंबूक की जननी का चरित्रांकन कर तत्कालीन समाज में व्याप्त जातिवाद तथा राम जैसे राजा को उनकी मंत्री-परिषद द्वारा न्याय मांगने शंबूक की जननी की बात अच्छी तरह सुने बिना जंगल में जाकर शंबूक की तपस्थली पर ही हत्या कर देने जैसे वीभत्स कार्य को सामने लाने में कुछ भी हिचकिचाहट कवि ने अनुभव नहीं की। यह महाकाव्य पढ़ने के बाद मेरे भीतर उद्भ्रांत जी की छबि धार्मिक धरातल को पार करती हुई कार्ल मार्क्स की “दास कैपिटल” में वंचितों द्वारा अपने अधिकार प्राप्त करने की पृष्ठभूमि में नज़र आने लगी। अंधी भक्ति में बहे बिना तथा अग्रजों द्वारा खींची गई लकीर को मिटाये बिना उन्होंने उन्हीं पात्रों को समसामयिक धरातल पर स्थापित करते हुए सामाजिक कुरीतियों से ऊपर उठने का आह्वान किया है।

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