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राधामोहन गड़नायक के काव्य में आत्म-अभिव्यक्ति

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ययाति नगर में एक दिन

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श्री प्रकाश चन्द्र पारख,पूर्व सचिव,कोयला मंत्रालय,भारत सरकार की पुस्तक “कोल-कोनन्ड्रम:द एग्जीक्यूटिव फेलियर एंड ज्यूडिशियल एरोगेन्स” की समीक्षा

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राधामोहन गड़नायक के काव्य में आत्म-अभिव्यक्ति

Published On 19-03-2019

राधामोहन गड़नायक के काव्य में आत्म-अभिव्यक्ति

मूल आलेख :- शांतनु कुमार सर,

सेवानिवृत्त प्रिन्सिपल,

राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय,

अंगुल(ओड़िशा)

अनुवाद:- दिनेश कुमार माली



राधामोहन गड़नायक ओडिशा के बहुआयामी प्रतिभाशाली कवि थे,इसलिए उन्हें किसी भी विशिष्ट वर्ग में बांटकर नहीं देखा जा सकता। एक तरफ वह रोमांटिक कवि है तो दूसरी तरफ क्लासिक, एक एक तरफ गाथा कवि है तो दूसरी तरफ गीति कवि,एक तरफ छंदमुक्त कविताएं लिखते हैं, तो दूसरी तरफ छंदबद्ध। जहां रोमांटिक कविताओं में मनोभाव की प्रधानता,आत्म केंद्रितता तथा मनुष्य के हृदय की सुषुप्त असीम इच्छाओं को प्रकट करने की अदम्य भाव-प्रवणता होती है,वहीं क्लासिक कविताओं में अध्यात्मिकता,दर्शन और काव्य-कला की निपुणता का खास महत्व होता है। कवि राधामोहन की कविताओं में अलंकृत भाषा-शैली,शब्दों का सटीक प्रयोग,ध्वन्यात्मकता,छंदबद्धता उन्हें क्लासिक कवि का दर्जा दिलाती है।

दूसरी तरफ आत्म-सचेतनता और आत्माभिव्यक्ति से ओत-प्रोत भाषा-शैली उन्हें रोमांटिक कवियों में शुमार करती है। उनकी अधिकांश कविताओं में तीव्र कल्पना शक्ति और प्रबल मनोवेगों के कारण उन्हें उच्च कोटि का रोमांटिक कवि कहा जाए तो उसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यही नहीं,गाथा कविता में भी उनका कोई सानी नहीं है। विषय-वस्तु की विविधता,नाटकीयता,भाषा-शैली और नए-नए छंदों का प्रयोग कर गाथा कविता में भी प्राण फूँक दिए हैं। देखा जाए तो गाथा कविता वस्तुनिष्ठ और वैयक्तिक होती है,जबकि गीति कविता अंतरंग और आत्माभिव्यक्ति से भरपूर। राधामोहन जी की दोनों प्रकार की कविताओं में ये गुण देखने को मिलते हैं।

उनकी अधिकांश कविताओं के केन्द्र-बिदु है व्यक्ति-सत्ता,जीवन और उनके दर्शन के बारे में सहज अनुमान लगाया जा सकता है। मेरे इस आलेख का मुख्य उद्देश्य है- उनके काव्य में आत्माभिव्यक्ति और आत्मकथाओं का अनुसंधान करना।

अंग्रेजी साहित्य में रोमांटिक युग के प्रमुख कवि है वर्ड्सवर्थ। उनकी प्रसिद्ध कविताओं ‘Tintern Abbey’ तथा ‘Prelude’ में अंतर्द्वंद्व,आत्म-विश्लेषण और आत्माभिव्यक्ति की झलक मिलती है। कवि भी पहले एक मानव है,इसलिए उनकी कविताओं की अंतर्वस्तु में मनुष्य जीवन के बिम्ब तथा परिवर्तनशील प्रकृति के कथानक मिलते हैं। उनकी अधिकांश कविताओं में ‘मैं’ और ‘मेरा’ शब्दों का प्रयोग हुआ है,जो उनकी आत्मा-चेतना और जीवन-दर्शन को दर्शाता है। इसे अंग्रेजी कवि कीट्स ‘कवि की दुर्बलता’ मानते हैं तथा इसे ‘egotistical sublime’ की संज्ञा देते हैं। इसकी विशद व्याख्या उन्होंने अपने घनिष्ठ मित्र रिचर्ड वुडहाउस के पत्राचार के दौरान की,जो इस प्रकार है :-

“ As to the poetical character itself(I mean that sort of which,if I am anything,I am a member,that sort distinguished from the wardworthian or egotistical sublime,whichis a thing pure and stand alone).It is not itself- it is everything and nothing. It has as much delight in logo or an Imogen”.

सन् 1817 में कीट्स ने अपने भाई जॉर्ज और थामस को लिखे पत्र में इसे ‘नेगेटिव कैपेबिलिटी’बताया। वे इसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं,



“ At once it struck me,which quality went to form a man of achievement, especially in literature which Shakespeare possessed so enormously – I mean Negative Capability, that is when one is capable of being in doubts,uncertainities,without any irritable seaching after fact or reason”.

कीट्स के मतानुसार जिन कवियों में ‘नेगेटिव कैपेबिलिटी’ जितनी कम होती है, ‘ईगोस्टिकल सबलाइम’ उतनी ही ज्यादा होगी और वे कवि ‘अकवि’ कहलाते हैं, जिनका कोई निर्दिष्ट परिचय नहीं होता अर्थात् उनकी कविताओं में किसी भी आदर्श अवस्था, प्रसंग, दर्शन, चरित्र और मत का संबंध नहीं होता है, जबकि सारे पात्रों, मनोभावों और कालिक अवस्थाओं का ठीक से आकलन करना और अपनी कविताओं में उकेरना ही सच्चे कवि का सामर्थ्य होता है। आधुनिक कवि टी एस इलियट इस विचारधारा का समर्थन करते हैं। उनके शब्दों में, “ Poetry is not an expression of personality, but an escape from personality.”

साहित्यिक आलोचनाओं में इसके विरुद्ध भी अनेक तर्क आते हैं अर्थात् विश्व-साहित्य में कई ऐसे भी प्रसिद्ध कवि हुए हैं,जिन्होंने अपनी कविताओं में खुद को नायक के रूप में प्रस्तुत किया है तथा अपनी आत्माभिव्यक्ति भी अत्यंत ही सहज ढंग से की है। राधामोहन गड़नायक के काव्य स्वगतोक्ति,आत्म-कथन और आत्माभिव्यक्ति को पाठकों ने खुले मन से स्वीकार किया है। एक कवि किस तरह से अपने इन जीवनानुभवों,दर्शन और अनुभूतियों को सर्जनात्मक रूप देता है,इस पर विमर्श करना ही इस आलेख का मुख्य उद्देश्य है।

‘ कवि होने की मेरी इच्छा’ कविता में कवि राधामोहन गड़नायक जी लिखते हैं :-

“सभी के आंसुओं में, सभी का लहू

हृदय में लाकर बनाता हूँ महू

वह है मेरी विरासत

कवि बनने की चाह मेरी

रात-दिन,दिन-रात”।

प्रत्येक कवि की सर्जनशीलता की काव्य-प्रेरणा का स्रोत होती है प्राणियों की व्यथा, जिसे कवि रहस्यमयी तरीके से अपने इर्द-गिर्द परिवेश से संग्रहीत करता है और एक भिन्न सत्ता के रूप में बदल देता है। इस प्रक्रिया को आलोचक कॉलरिज तीन नए शब्दों “डिफ्यूज,डिस्जाल्व और डिस्सिपेट” से परिभाषित करते हैं। कवि राधामोहन गड़नायक रोमांटिक कविता के प्रेरक तत्व की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि कविता उनकी प्रेमिका है – रूठी प्रेमिका की तरह कविता का इंतजार करने से नहीं आती है,बल्कि जब उसे आना होता है तो वह बेमौसम बारिश की तरह बरसने लग जाती है। कवि के शब्दों में :-

“रूठी कविता की विषम रीति

समझ में नहीं आती उसकी तिथि

कभी-कभी आती वह विद्युत गति से

कभी-कभी हो जाती प्रबल संसृति

सृष्टि हेतु मेरी भाषा”।

राधामोहन गड़नायक जी की उपर्युक्त अनुभूति को नोबेल पुरस्कार विजेता पाब्लो नेरुदा नैसर्गिक प्रेरणा तत्व मानते हैं। उनके अनुसार –

And it was at that age …..

Poetry arrives in search of me. I don’t know,I don’t know

Whether it came from winter or a river.

जॉन कीट्स काव्य-प्रेरणा के इस तत्व को दूसरे ढंग से प्रस्तुत करते हैं, “ If poetry comes not as naturally as leaves to a tree, It had better not come at all”.

अगर कविता पेड़ पर पत्तों के आने की तरह नहीं आती है तो बेहतर यही रहेगा कि न आए।

उनके समसामयिक रोमांटिक कवि शैली(Shelley) भी इस मत की पुष्टि करते हुए लिखते हैं,

“ The mind in creation is as a fading coal,which some invisible influence, like an inconstant wind, awakens to transitory brightness……..”

अर्थात् किसी भी अदृश्य प्रभाव या चंचल हवा के झोंके से बुझते हुए अंगारे की चिंगारियों की तरह सर्जन-चेतना उदभासित हो सकती है।

कवि राधामोहन अपनी कविता ‘ दीनकृष्ण दास’ में लिखते हैं –

“ रसमय कृष्ण मेरे काव्य के नायक

दीनकृष्ण दास – मैं केवल गायक”।

एक जगह प्रसिद्ध ओडिया कवि श्री रमाकांत रथ ने अपने साक्षात्कार में कहा है कि ‘ श्रीराधा” काव्य लिखते समय उन्होंने यह अनुभव किया है मानो कोई अदृश्य शक्ति बोल रही हो और वह अनजाने में उसे लिखते जा रहे हो। ये सब अनुभूतियाँ नैसर्गिक दिव्य-प्रेरणा नहीं तो क्या है ! ग्रीक और रोम इस अदृश्य शक्ति को ‘Muses’ कहते हैं।

एक अन्य कविता में कवि गड़नायक कविता की परिभाषा और उसके स्वरूप की व्याख्या करते हुए लिखते है :-

“ कविता नहीं बनती, बंधु,पद से पद जोड़ने से

कविता नहीं बनती, बंधु, सुरीली राग में छंद गाने से,

कविता प्राण का धर्म है,हृदय की विदग्ध ममता

शोक का सजल श्लोक है,वेदना की विप्लव गाथा

पपीहा-हिय के रक्तिम गुलाब की लाल-सी

कविता जी उठती है प्रेरणा-रस, उत्स-सी”।

कवि की एक और बहूचर्चित कविता है, ‘ विपथगामी’। कवि अपनी विपथगामी चेतना से सदैव नए-नए आविष्कार करने में लगे रहते हैं। छंद-प्रिय कवि गड़नायक की भाषा में इसे कह सकते हैं ‘थिंकिंग आउट ऑफ बॉक्स और इस संदर्भ में पारंपरिक सीमाओं को तोड़ने की उनकी तीव्र अभिव्यक्ति इस कविता में प्रखर होती है :-

“ नहीं चाहिए, मुझे पाशबद्ध जीवन

नहीं चाहिए मुझे, अंधा-अनुकरण

नहीं चाहिए, मुझे मुग्ध-मरण

दुर्वार, हूँ मैं अपथगामी

अपथ पर मैं चलूँगा,अपथ पर

चाहे करो मेरा कितना भी तिरस्कार

नैपथ्य में छुपे हैं जितने सब

करूंगा मैं उन सबका आविष्कार”।

इस संदर्भ में केंद्रीय साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत उनके कविता-संग्रह ‘ सूर्य और अंधकार’ में संकलित ‘ डुबिवि एथर’ कविता पर विमर्श किया जा सकता है। कवि लंबे समय से असंतुष्ट है। उसके दुख का कारण है, काव्य के स्वरूप का उदघाटन करने तथा उसे शब्दों में ढालने में सामर्थ्य का अभाव। कवि ‘सिसिफस’ होता है , यह कवि-कर्म है। कवि का मोहभंग हुआ है क्योंकि अभी तक वह केवल बाहरी सौन्दर्य और दिखने वाली वस्तुओं का ही चित्रण कर रहा था। सामूहिक चेतना और अनुभूति का यह archetype है। कवि अनुभव कर रहा है मानो वह झागदार समुद्र में तैर रहा हो,मगर उसे रत्न मिले या न मिले, वह अपने अनुसंधान में समुद्र का सीना भेद कर रहेगा – सही अर्थों में, यह सच्चे कवि का कार्य है,जो जय-पराजय की सीमा से ऊपर है। कवि के शब्दों में,

“डूब जाऊंगा अब

समुद्र की प्रशांत जलराशि में

समुद्र के अथाह गर्भ में

संधान करूंगा समुद्र के प्रछन्न अंतर का।

****************

अगर मुक्ता मिल गए तो विजय मेरी

अगर मुक्ता नहीं मिली तो भी विजय मेरी”।

अमेरिकन कवि राबर्ट फ्रास्ट के कथन “ woods are lovely, dark ,and deep ....” की तरह कवि गड़नायक की काव्यिक संकल्पना को लिया जा सकता है। मगर इस संकलन की दूसरी कविता ‘खोला ए प्रांतरे’ में कुछ नया आविष्कार करने और परिवेक्षण करने की निष्ठा एवं प्रतिबद्धता इन मार्मिक पंक्तियों में साफ झलकती है :-

“ मैं देखूंगा यहाँ बैठकर वह चित्र

जो पहले कभी दिखाई नहीं दिया

मैं लिखूंगा यहाँ बैठकर वह काव्य

जो पहले कभी लिखा नहीं गया ”।

कवि की कविता ‘सजाअना सजनी’ एक अति सुंदर ‘सोनेट’ है। इस कविता में न तो कृत्रिमता है और न अनुशासनहीनता, बल्कि एक उन्मुक्त प्रतिवाद है। कवि नैसर्गिक और स्वतःस्फूर्त जीवन के प्रगल्भ गायक है। पोखरियों में खिलते कमल,गगन में टिमटिमाते तारों,जंगलों में पेड़-पौधों के झुरमुटों,नदी का अनियंत्रित प्रवाह आदि बिंबों के समांतराल कवि ने अपने नीरस बेचैन जीवन को कविता में ढालने का प्रयास किया है।

‘उपसंहार, कविता में उन्होंने लिखा है :-

“ मत सजाओ, ऐ सजनी इस जीवन को,

छोड़ दो ऐसे ही

प्रकृति को हमारी गोद में,

प्रकृति के उन्मुक्त आँगन में”।

ऐसी ही अनुभूति राबर्ट हेरिक की कविता ‘ डिलाइट इन डिस्सार्डर’ में मिलती है। सहज सामान्य वेशभूषा और परिपाटी में वह सौन्दर्य है,आप सप्रयास कलात्मक कृतियों के निर्माण में जिन आनंद की अनुभव करते हैं,उससे कम नहीं है। कवि हैरिक के शब्दों में,

“ A careless so string,in whose tie

I see a wild civility

Do more bewitch me than when art

Is too precise in every part”.

कवि गड़नायक ने कुछ दिनों के लिए अंगुल जिले के रिकॉर्ड रुम में कॉपिस्टर का काम किया।,मगर उनका यह कार्य उनके स्वाधीन चेतना, सर्जनात्मक काव्य-सत्ता को बुरी तरह से बाधित कर रही थी। जिसका उन्होंने अपनी कविता’अकल विहीन नकल’ की यांत्रिकता तथा नौकरी के अनुशासनबद्धता की व्यथा को कविता ‘अकल नवीस’ में मार्मिक रूप से प्रस्तुत किया है। एक तरफ स्वतन्त्रता और कविकर्म के लिए तीव्र आसक्ति तो दूसरी तरफ अनासक्त भाव से किया जाने वाला नीरस सरकारी कार्य – इस असंतुलन का कवि ने कलमबद्ध किया है,

“ कलम पकड़ते ही अंतर मेरा झरने लगता है खाली

कॉपि-कर्म कर रहा हूँ आज छोडकर कवि धर्म झोली

मन उड जाता है शरीर से,सोचकर सब दुर्वह

कवि करने लगता है कॉपि कर्म ‘क’ की जगह लिखकर ‘व’।

उन्होंने अपने काव्य-नाटक ‘कालिदास’ के ‘आभास’ में लिखा है “कवि केवल कवि नहीं होता है, बल्कि वह अपने काव्य का नायक भी होता है। दूसरों के खातिर वह अपने स्नेह-प्रीति,सुख-दुख,अनुभूति-विभूति सभी को प्रकट करता है।“ उनकी बहुचर्चित कविता “मौसुमी” में बाह्य जगत की यथार्थता और मानव-जीवन के दर्शन का अत्यंत ही सुंदर प्रतिफलन हुआ है। ‘मौसुमी’ कविता दृश्य-बिंबों की तरह भय के अनुभव संचार करने के बाद भी कल्याणकारी मौलिकता लिए हुए हैं। कवि शैले की कविता ‘वेस्टलैंड’ की तरह विध्वंसकारी,संरक्षणकारी वर्जनयोग्य,जो मृत एवं अनावश्यक प्रवृतियाँ है,उन्हें तोड़कर जो नूतन मौलिक सर्जन, जो समाज कल्याण के लिए अति आवश्यक है, उन्हें संरक्षित करना ही इस कविता का प्रमुख उद्देश्य है। ‘मौसुमी’ और कुछ नहीं बल्कि सृष्टि संसार के प्रतीक चिर कल्याणमयी और रौद्ररूप धारण करने वाले शिव ही है। इस कविता की हृदयस्पर्शी पंक्तियाँ इस प्रकार है :-

“ क्या समझ रहे हो मुझे?

आलुलित केश

विलुलित वेश

दैत्य सम ?

********

डरो मत मुझसे,डरो मत, हे मृत्य जीव

रुद्र जैसी यह मूर्ति मेरी,मैं ही तो शिव !

कवि और मौसुमी एक दूसरे में घुल-मिल गए हैं एकात्म और एकाकार होकर। इस विशाल सृष्टि के कल्याण हेतु कवि राधामोहन लिखते हैं :-

“नरम नहीं हूँ,क्रम नहीं हूँ,न ही धीर

उग्र मैं आज,व्यग्र में आज,अग्रसर ।

******************

पीड़ित प्राणियों के कल्याण हेतु देता हूँ जीवन

दुर्दिन बनकर सृष्टि में लाता हूँ दुर्दिन”।

ऐसी ही उनकी विशिष्ट कविता है ‘दुर्मुख’ जिसमें कवि अपने आपको शील,संभ्रम और शिष्ट न समझकर अप्रिय सत्य बोलने वाले दुर्मुख से तुलना करते हैं। इस कविता में उन्होंने दुर्गम पहाड़ी इलाकों से होकर बहने वाली, कोलाहल करती, झागदार साँसों के साथ विद्रूप हंसी हंसने वाली नदी के रूप में अपने को रूपायित किया है। सारे बाधा-बंधन,प्रताड़णा,छल-कपट,मंत्रणा को झेलने वाला कवि मधुरभाषी चारुवाक हो सकता है? कदापि नहीं,अर्थात् वह दुर्मुख होने के लिए बाध्य है –

“चारुवाक हो पाऊँगा किस तरह,

इस छल-कपट की दुनिया में

दुर्मुख हूँ मैं,रुक्ष इस धरातल पर”।

इस तरह यह कह सकते हैं कि कवि राधामोहन जी को साहित्य के बंधे-बंधे साँचे में नहीं ढाला जा सकता है। उनकी कविताओं ‘चाय’ और ‘अमृत-लुंठन’ में मार्क्सवादी वामपंथी विचारधारा की झलक दिखती है। उनकी ‘चाय’ कविता में मिथकीय समुद्र-मंथन की पृष्ठभूमि है और अपने आपको सर्वहरा कहकर हवाई सपनों में नहीं खोने का उपदेश देते हैं। क्योंकि रंगीन सपने देखना तो बुर्जुआ लोगों का विलासी कार्य है। अत्यंत ही सुंदर ढंग से कवि ने इसे प्रस्तुत किया है कि समुद्र-मंथन से निकलने वाला अमृत तो देवताओं के लिए तथा विष नीलकंठ महादेव के लिए। फिर क्या बचा रह जाता है समाज के अन्य वर्गों के लिए? व्यंग्यात्मक तरीके से कवि अपना रोष प्रकट करते हैं :-

“हे मेरी सखी,देर मत करो

कप में मुझे चाय परोस दो”।

उपर्युक्त दोनों कविताओं में ‘अमृत’ सुख-समृद्धि,संभोग और आभिजात्य वर्ग का प्रतीक है। कवि अपने आपको वंचित वर्ग से जोड़कर कहते हैं-

“नियम तो ऐसा बना कि अमृत हमारे लिए नहीं

वंचित वर्ग है हम नियम कानून हमारे लिए वक्र

राहू के लिए जैसे चक्र”।

दुनियादारी से उत्पन्न वेदना और यातना के झागदार जहर पीने की दक्षता ‘धुर्जटी’ रखते हैं। इसी तरह ‘अमृत-लुंठन’ कविता में कवि कहते हैं कि अमृत पीने का अधिकार कोई नहीं देगा। कवि के शब्दों में :-

“ज़ोर जबर्दस्ती अगर हम नहीं लेंगे

अपनी तरफ से कौन देगा साथी ?

आज हम जलाएंगे रक्त-शिखा

जगाएँगे अरुण-प्रभाती “।

ये पंक्तियाँ याद दिलाती है कार्ल मार्क्स की युगांतरकारी घोषणा – “ विश्व के सभी श्रमिक भाइयों इकट्ठे हो जाओ, तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है – सिवाय पाश-बंधन के ”।

कवि भी इस मार्क्सवादी विचारधारा का समर्थक है और कहते हैं कि भले ही, हम दानवों की तरह अमृत नहीं लूट सकते हैं मगर,

“चौर्य नहीं है शौर्य ,आज गरुड़-सा

लूटेंगे हम वह अमृत भंडार

जन्मसिद्ध न्याय हमारा अधिकार

हमारे हक-सा।“

गहन आशावादिता ही इस दर्शन की आधारशिला है। जिसके अनुसार वंचित सर्वहरा उपेक्षित वर्ग की विजय होगी और दूसरों को दबाकर अपनी आत्म-केन्द्रित परिधि के भीतर, जो अमृत पान कर रहे हैं, उनका पतन अवश्य होगा। इस विश्वास की अलख जगी है उनकी इस कविता में :-

“ धरती पर करेंगे कर्म जनहित

जनता की अरुण प्रभात”।

कुछ दिनों के लिए कवि और डॉ. मायाधर मानसिंह ने प्रौढ़-शिक्षा विभाग में एक साथ काम किया था,मगर विवादास्पद परिस्थितियों के कारण उन्हें अपना पद छोडना पड़ा। इस घटना का उल्लेख कवि मानसिंह के आलेख ‘शिक्षाविदों की गाथा’ में मिलता है। कवि गड़नायक के आत्मा की चीख उनकी कविताओं ‘कलंकित मुंह कलाकार !!!’ तथा ‘वंदना के लिए जल रही दीवाली,जल रही कहाँ !” में सुनाई पड़ती है कि उसके लिए जिम्मेदार कौन है ? आग्नेय जिज्ञासा अभी भी जला रही है अंतरात्मा? कवि गड़नायक के पक्ष में डॉ. कुंजबिहारी दाश ने सन् 1957 में झंकार पत्रिका में ‘वंदना के लिए जल रही दिवाली’ कविता लिखी थे और उसके परवर्ती संस्करण में कवि गड़नायक की कविता “वंदना के लिए जल रही है दिवाली,जल रही कहाँ ?” प्रकाशित हुई थी।

इस आत्मकथनात्मक कविता में कवि के धारदार स्वर मुखरित हुए हैं। इस कविता में कवि ने अपने आपको ‘दुर्मुख’ और जीवन-पथ पर रुद्र ताल से गमन करने वाले ‘मौसुमी’ से तुलना की है। देश की आजादी के लिए भी किशोर गड़नायक ने अहम भूमिका निभाई थी – “ मुक्ति समर अभियान पथ पर अग्रसर था मैं तरुण”। स्वतंत्र जीवन जीने वाले स्पष्ट-वक्ता कवि ने सरकारी नौकरी करने पर डॉ. दाश द्वारा उठाए गए सवाल का उत्तर अपनी कविता “शोणितर स्वप्न”में दिया है। देश में हो रहे शोषण,अन्याय,अत्याचार और कुछ व्यक्तियों के विलासी जीवन को “ वाणी के पुजारी लक्ष्मीहरा,सर्वहरा में अभिव्यक्त किया है।

“ वाणी तीर्थ का उपासक मैं

काव्य-सृष्टि धर्मधारी

जनशिक्षा लेखन हेतु

हुआ मैं उत्पादन-कर्मचारी”।

वे ‘वनमुल्क के बाघ-सिंह के वंशज’ और सरकारी सर्कस से वशीभूत न होकर उनका अनुकरण नहीं कर जाए। अत्यंत ही मर्मस्पर्शी शैली में वे लिखते हैं :-

“ कल के भीतर नहीं कर पाया

सफेद को काला,काले को सफेद

लिख नहीं पाया चतुर चुट्कला

चाटुकला”।

‘आहत हृदय’,’कालिमा’ और ‘अपवाद के पुरस्कार ‘ कविताओं में कवि गड़नायक ने कुछ प्रश्न उठाए है “वंदना के लिए जलती है दिवाली,जल रही है कहाँ?

कहो,कवि कहो,कहो,एक बार”।

इस समीक्षा से यह स्पष्ट होता है कि कवि गड़नायक काव्य-नायक है। उनके आत्म-कथन और आत्माभिव्यक्ति उनकी जीवन-चर्या,जीवन-दर्शन और सारस्वत नांदनिक तत्वों के बारे में स्पष्ट धारणा प्रस्तुत करते हैं। कवि राधामोहन गड़नायक पर ‘ style is the man’ का अभिकथन पूरी तरह से लागू होता है।
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