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सरोजिनी साहू की श्रेष्ठ कहानियां

भारतीय साहित्य में सरोजिनी साहू एक चर्चित नाम . अंग्रेजी और ओडिया दोनों भाषाओँ में अपने सक्षम लेखन-कार्य के लिए जाने-पहचाने इस व्यक्तित्व की कहानियों में नारीत्व का अहसास , सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति, गहरा जीवनबोध तथा कलात्मक परिधियों को ऊंचाई तक पहुंचा पाने का श्रेय कहानीकार को जाता है. उनकी चंद चुनी हुई कहानियों का अनुवाद हिंदी पाठकों के लिए पहुंचाने हेतु मेरा यह ब्लॉग. पाठकों को पसंद आये तो समझूंगा मेरा श्रम सार्थक हुआ.

जगदीश महान्ति की श्रेष्ठ कहानियाँ

ओडिया साहित्य में ट्रेंड-सेटर के रूप में विख्यात इस कथाकार की कहानियों का दौर सत्तर दशक से शुरू हुआ था। आपको ओडिया कहानियों के कथ्य, भाषा- शैली तथा प्रयोग में आमूल परिवर्तन के जनक के रूप में जाना जाता हैं। अपने कहानी लेखन के लिए ओडिया साहित्य के सम्मान जनक शारला पुरस्कार तथा ओडिशा साहित्य अकादेमी पुरस्कार से आपको नवाजा गया हैं।

उद्भ्रांत जी का महाकाव्य "त्रेता: एक सम्यक विवेचन"

मूल नाम : रमाकांत शर्मा,जन्म : 4 सितंबर 1948, नवलगढ़ (राजस्थान) त्रेता, अभिनव पांडव, राधामाधव, स्वयंप्रभा, वक्रतुंड, अनाद्यसूक्त, ब्लैकहोल, प्रज्ञावेणु, अस्ति, इस्तरी, हँसो बतर्ज रघुवीर सहाय, शब्दकमल खिला है, काली मीनार को ढहाते हुए, लेकिन यह गीत नहीं, मैंने यह सोचा न था, डुगडुगी, मेरी प्रगतिशील काव्य-यात्रा के पगचिह्न, आलोचना का वाचिक, सृजन की भूमि, मेरी प्रगतिशील काव्य-यात्रा के पगचिह्न, आलोचना का वाचिक, सृजन की भूमि सम्मान:- निराला पुरस्कार, शिवमंगल सिंह सुमन पुरस्कार

चीन में सात दिन

चीन की साहित्यिक यात्रा मेरे लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण थी। जैसे ही चार-पांच महीने पूर्व डॉ. जय प्रकाश मानसजी की इस बार चीन में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के आयोजन किए जाने की घोषणा अंतरजाल पर पढ़ी, वैसे ही मन ही मन ह्वेनसांग व फाहयान के चेहरे उभरने लगे, दुनिया के सात आश्चर्यों में से एक आश्चर्य चीन की दीवार आँखों के सामने दिखने लगी और चीन की विकास दर का तेजी से बढ़ता ग्राफ मानस-पटल पर अंकित होने लगा। याद आने लगा वह पुरातन भारत जिसमें ह्वेनसांग,शुयान च्वांग व फाहयान चीन से यहाँ पढ़ने आए होंगे,तब चीन कैसा रहा होगा और नालंदा व तक्षशिला विश्वविद्यालय के वर्तमान खंडहर खोज रहे होंगे अपनी जवानी को उनकी पुस्तक "ट्रेवल टू इंडिया" के संस्मरणों में।

जगदीश मोहंती के ओडिया उपन्यास "निज निज पानीपत" का हिन्दी अनुवाद "अपना अपना कुरुक्षेत्र"

जगदीश मोहंती का उपन्यास ‘निज–निज पानीपत’ ओड़िशा की सबसे पुरानी भूमिगत कोयले की खदान हिंगीर रामपुर कोलियरी की कार्य-संस्कृति, श्रमिक-संघों की पारस्परिक प्रतिस्पर्धा तथा अपने-अपने काम निकालने के लिए अपनाई जाने वाली अंदरूनी रणनीति, प्रबंध के सभी स्तरों मैनेजर,सब एरिया मैनेजर (डिप्टी चीफ माइनिंग इंजीनियर) तथा जनरल मैनेजर द्वारा लिए गए विरोधाभासी निर्णयों का यथार्थ-चित्रण तथा साथ ही साथ, महिला-मंडल की अधिकारियों के प्रमोशन में महती भूमिका के बारे में अत्यंत ही सटीक, बेबाकी तथा निर्भयतापूर्वक वर्णन किया गया है। यद्यपि यह उपन्यास सन 1990 में लिखा गया था, मगर आज भी कोयला खदानों के पारंपरिक प्रबंधन के साथ-साथ कुछ हद तक वही कार्यशैली, कार्य-संस्कृति, रहन-सहन के ढंग, आंतरिक व बाहरी परिवेश देखने को मिलता है।

डॉ विमला भण्डारी की रचनाधर्मिता

साहित्य-साधना की रजत-जयंती पूरी करने वाली विमला दीदी के समग्र साहित्य की एक संक्षिप्त झलक आप इस पुस्तक के माध्यम से देख सकेंगे और साथ ही साथ, उनकी साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन व विश्लेषण के द्वारा उनकी संवेदना,चिंतन व विचारधारा से आप परिचित हो सकेंगे। मुझे विश्वास है कि प्रस्तुत कृति साहित्य प्रेमियों,शोधार्थियों और आमजन हेतु उपयोगी सिद्ध होगी।

साहित्यिक सफर का एक दशक

“साहित्यिक सफर का एक दशक” पुस्तक की रचना करने का मेरा उद्देश्य था, जो कुछ मैंने एक दशक के भीतर इधर-उधर लिखा और जो कुछ इधर-उधर प्रकाशित हुआ, चाहे भूमिका, समीक्षा या मूल्यांकन, चाहे संस्मरण, चाहे साक्षात्कार अथवा बड़े-बड़े लेखकों के जीवन संबन्धित आलेखों के रूप में क्यों न हो, उन सभी विधाओं को एक साथ जोड़कर माला के रूप में पिरोना। मैंने सन 2014-15 में जिन लेखकों की कृतियों का अध्ययन किया और जिनके लेखन, संस्थानों, व्यक्तित्व या साहित्यिक घटनावलियों ने मुझे प्रभावित किया, उन विषयों या स्मृतियों पर मैंने कलम चलाने का क्षुद्र प्रयास किया है। ये सारी रचनाएँ वेब पत्रिकाओं में सृजनगाथा, युगमानस, रचनाकार तथा मुद्रित पत्रिकाओं में रायपुर से प्रकाशित होने वाली गिरीश पंकज की ‘सद्भाव दर्पण’, मायामृग के बोधि-प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘उत्पल’ में प्रकाशित होकर हिन्दी पाठकों का बहुत हद तक ध्यान आकृष्ट किया है।

श्री पी.सी.पारख,पूर्व कोयला सचिव,भारत सरकार का "शिखर तक संघर्ष"

.श्री प्रकाश चंद्र पारख,पूर्व सचिव (कोयला),भारत सरकार की बहुचर्चित पुस्तक "Crusader or Conspirator?" का हिन्दी अनुवाद 'शिखर तक संघर्ष' है,जो अभी तक अप्रकाश्य हैं। इस ब्लॉग में पारख साहब के संस्मरण,भ्रष्टाचार के कारणों,कोलगेट घोटाले के तथ्यों एवं भविष्य में इन घटनाओं से बचने हेतु अपने सुझाव भी दिए हैं। हिन्दी पाठकों को यह ब्लॉग अत्यंत ही रुचिकर लगेगा।साथ ही साथ,ईमानदारी से अपने कर्तव्य निर्वहन के लिए प्रेरित करेगा।

ओड़िया भाषा की प्रतिनिधि कविताएं

अट्टालिकाओं से भरा हुआ एक सुंदर नगर चारों तरफ जिसके हिलोरे खाता लाल-सागर अनगिनत नदियाँ, झरनें, पहाड़-जंगल छोटी-छोटी हटलियों से खचाखच भरा यह स्थल घाट-घाट का पानी पीकर साना सारा जीवन नजर नहीं आया ऐसा सुंदर वतन मेरे नयन जिधर भी जाओ मगर लगा रहता मेरा मन हमेशा तड़पता करने को इसके दर्शन सही में यहाँ कुछ नहीं ऐसी विशेष संपत्ति

तालचेर की कोयला खदानों के प्रसिद्ध श्रमिक नेता के ओड़िया कविता-संकलन "सीमंतिनी" का हिन्दी अनुवाद

यह कहा जा सकता है कि इस वैविध्यतापूर्ण कविता-संग्रह में कवि की सूक्ष्म अंतरदृष्टि,स्पष्ट अभिव्यक्ति,सामाजिक विसंगतियों और विद्रूपताओं पर करारा प्रहार,विक्षोभ,निर्भयता,यथार्थवादिता के दर्शन होते हैं। कवि की प्रतिभा और कविता के मर्म ने अनेक ओड़िया पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है।यह हिन्दी अनुवाद हिंदी जगत के लिए एक वरदान साबित हो, ऐसी मेरी कामना है।

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित ओडिया कवि सीताकान्त महापात्र का यात्रा संस्मरण "हार्वर्ड के वे दिन"

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित डॉ.सीताकांत महापात्र का नाम न केवल भारतीय साहित्य में वरन विश्व साहित्य में भी अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज करवाता है। एक प्रबुद्ध प्रशासक और साहित्यकार होने के साथ-साथ नृतत्व (मानविकी) विषय पर आपका विशेष अधिकार है। भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में पूरे देश में अव्वल होने तथा परवर्ती प्रशासनिक सेवाओं में उत्कृष्ट योगदान देने के लिए भारत सरकार की तरफ से आपको कैंब्रिज एवं विश्वविद्यालय में बतौर ‘फ़ेलो’ के रूप में भेजा गया। वहां पर भी वर्ष के अंत में होने वाली लिखित परीक्षा में सबसे ज्यादा अंक प्राप्त कर आपने हमारे देश का नाम गौरवान्वित किया।

सरोजिनी साहू के प्रसिद्ध ओडिया उपन्यास "विषादेश्वरी" का हिन्दी अनुवाद

वे लोग तीन महीनों से विधिवत इस खेल में लगे हुए थे। एक अद्भुत खेल, परत-दर-परत खोलते हुए मानो वे एक गहनतम प्रदेश के प्रवेश द्वार तक पहुंच गए थे। अवश्य हर्षा को यह खेल खेलना नहीं आता था।अल्बर्टो की सबसे पहले इच्छा हुई यह खेल खेलने की। जब अल्बर्टो ने यह खेल खेलने का प्रस्ताव रखा तो हर्षा को उसका बचपना-सा लग रहा था। अल्बर्टो ने कहा था कि पुर्तगाल में यह खेल एक दूसरे को जानने तथा परस्पर एक दूसरे के नजदीक आने के लिए खेला जाता है।

चकाडोला की ज्यामिति

तालचेर के प्रख्यात कवि विरंचि महापात्र के अद्यतन कविता-संग्रह "चकाड़ोला की ज्यामिति" को ‘प्रबंध-काव्य’ की श्रेणी में गिना जाए तो इस कथन में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस संग्रह में संकलित 68 कविताएं चकाड़ोला पर ही आधारित हैं। 'चकाडोला’ अर्थात् चक्र जैसी गोल आँखों की पुतलियाँ। राजस्थानी भाषा में डोला शब्द की जगह बोलचाल की भाषा में 'डोरा' शब्द का प्रयोग होता है।

मेरा तालचेर

‘मेरा तालचेर’ कविता-संग्रह तालचेर के स्थानीय कवियों की कविताओं का एक अनूठा संकलन है, जिसमें देश-भक्ति तालचेर के इर्द-गिर्द कोयलांचल की औद्योगिक गतिविधियों,पर्यावरण तथा छिन्न-भिन्न होते सामाजिक रिश्तों के कथानकों का उल्लेख है। यह कविता-संग्रह ओडिया भाषा के वरिष्ठ साहित्यकारों,लेखकों तथा कवि-कवयित्रियों के सान्निध्य में ‘मने पकाओ’ नामक तालचेर की गैर सरकारी साहित्यिक संस्था द्वारा स्थानीय कवियों को पंद्रह अगस्त तथा छब्बीस जनवरी को कविता पाठ करने का अवसर पर उनके द्वारा गाई हुई कविताओं पर वरिष्ठ आलोचकों द्वारा तत्काल प्रतिक्रिया व समीक्षा वाचन कर नवोदित रचनाकारों को पल्लवित होने का अवसर प्रदान करने के लिए उठाया गया एक सार्थक कदम है, जिससे नवोदित रचनाकार अपने स्तर की जांच कर उसमें और सुधार लाने का प्रयास करते हुए अपनी साहित्यिक यात्रा को सुरुचिपूर्ण बनाते हुए सफल बना सकते हैं।

ओड़िया भाषा का सर्वाधिक प्रसिद्ध उपन्यास "अमावस्या का चाँद"

ओड़िया साहित्यकार डॉक्टर प्रसन्न कुमार बराल द्वारा संपादित ओड़िया पत्रिका ‘गोधूलि लग्न’ में जब मैंने बैरिस्टर गोविंददास के अन्यतम उपन्यास ‘अमावस्या का चांद’ पर उनकी समीक्षा पढ़ी तो मैं भाव-विभोर हो गया।मुझे ऐसा लगा मानो मेरे हाथ में अमूल्य साहित्य का कोई छुपा हुआ बहुत बड़ा खजाना लग गया हो।तत्काल मैंने भुवनेश्वर में लगे पुस्तक मेले से इस उपन्यास को खरीदने की व्यवस्था की और खरीदकर उसे बड़े चाव से पढ़ने लगा।जैसे-जैसे मैं उसे पढ़ते जा रहा था,वैसे-वैसे इस उपन्यास के मुख्य पात्र काउल में मुझे कभी भगवतीचरण वर्मा के कालजयी उपन्यास ‘चित्रलेखा’ के नायक ‘बीजगुप्त’ तो कभी मुंशी प्रेमचंद के विख्यात उपन्यास ‘सेवासदन’ के गजाधर पांडे तो कभी धर्मवीर भारती के कालजयी उपन्यास ‘गुनाहों के देवता’ का नायक ‘चंदर’ की याद ताजा हो जाती थी

मोनालिसा जेना की ओड़िया कहानी-संग्रह "बीच में छायाएँ"

नागाफ़ाक़ी,पथर जो एक ताजा सपना बन गया और 14 फरवरी बहुत प्रशंसित कहानियाँ है, जो हमारे उच्च समाज की गुप्त दुनिया की विरोधाभासी अपेक्षाओं, प्यार की गहराई, गद्दारों, और नकार देने पर आधारित हैं।

सरोजिनी साहू के ओडिया उपन्यास "पक्षीवास" का हिन्दी अनुवाद "पक्षीवास"

लेखिका का उपन्यास 'पक्षी-वास' के बारे में संक्षिप्त में कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी- -''देखन में छोटो लागे, पर घाव करे गम्भीर''. सही शब्दों में ,'पक्षी-वास' एक छोटा-सा उपन्यास होने के बावजूद भी जिन बहुआयामी पहेलुओं एवं व्यावहारिक परिदृश्यों की पृष्ठभूमि पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता है, कि कोई भी सुधी पाठक अंतर्मन से प्रभावित हुये बिना नहीं रह सकता है। भले ही, उड़ीसा प्रांत तरह-तरह की प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर है, फिरभी यहां का आम आदमी किस कदर भूख से जीवन यापन करता है, उसका मर्मान्तक चित्रण लेखिका ने उड़ीसा प्रांत के पश्चिमी इलाकों जैसे कोरापुट, बोलांगीर आदि जिलों में रहने वाले आदिवासियों के जीवन पर गहन शोध कर अपने उपन्यास 'पक्षी-वास' के माध्यम से पेश किया है।

सरोजिनी साहू के प्रसिद्ध ओडिया उपन्यास "गंभीरी घर" का हिन्दी अनुवाद "बंद कमरा"

कटे हुए पंखों वाली एक परी हो तुम।" उसने लिखा था। हर रोज ऐसी ही कुछ-न-कुछ कविता लिखकर वह भेजता था, ठीक उसी तरह जैसे कोई अठारह-उन्नीस साल का एक नवयुवक अपनी स्कर्ट पहनने वाली प्रेमिका को लिख रहा हो। उसने अपने ई-मेल में लिखा था, "कटे हुए पंखों वाली एक परी हो तुम। तुम्हारे प्यारे-प्यारे उन पंखों को किसी ने अपने पास रख लिया है। अगर वे पंख तुम्हें कोई लौटा देता, तो क्या तुम मेरे पास होती ?"

ओड़िया भाषा की प्रतिनिधि कहानियाँ

भारतवर्ष की विभिन्न भाषाओं की प्रथम कहानी की तुलना में ‘रेवती’ की स्थान सामाजिक-यथार्थता,करुण-आवेदन और परिपक्व दृष्टिकोण के लिए एक स्वतंत्र महत्त्व रखता है। नारी-शिक्षा,प्रेम और कुसंस्कार खासकर इन तीन विषय-वस्तु पर आधारित ‘रेवती’ की पृष्ठभूमि भले ही है,मगर आर्थिक और स्वास्थ्य सेवा से वंचित ओड़िशा राज्य की दुर्दशा को भी प्रदर्शित करती है। फकीर मोहन के जमाने के ओड़िशा में दुर्भिक्ष का दुर्भाग्य चारों ओर छाया हुआ था। इतिहास में अनेक युगों तक समृद्ध यह जाति अपनी मातृभाषा की सुरक्षा को लेकर आतंकित हो गई थी।

सरोजिनी साहू की ओड़िया दलित कहानियाँ

यह एक महत्त्वपूर्ण कथा-संकलन है जिसमें ओड़िशा के दलित समाज का गहराई से चित्रण हुआ है । कहानियों के केंद्र में ओड़िशा का वह अंचल है जो छतीसगढ़ केरायपुर आदि स्थानों के सीमांत में स्थित है, दूसरी ओर इसकी सीमाएं आन्ध्रप्रदेश को भी छूती है ।

यदा-कदा

आजकल जब कभी मुझे कुछ समय मिल गया और कुछ लिखने का मन हुआ तो लिखता गया अपनी डायरी के पन्नों में हृदय की मुक्त अवस्था में , चाहे अनुवाद हो या कोई और विधा । बस, बन गया मेरा ब्लॉग 'यदा-कदा' ...

My English Writings @ Talcher

Sometimes I think , I should write in English language, also. I try to fulfill my this desire by writings some notes in my Diary. As these notes are written in Talcher Coalfields, So I give the title of my this blog as ' My English Writings @ Talcher'

गिरिजाकुमार बलियार सिंह के ओड़िया काव्य-संकलन "चारण चर्या"का हिन्दी अनुवाद

श्री गिरजाकुमार बलियारसिंह जाने-माने ओड़िया कवि है, जो अपनी कविताओं में लयबद्धता, संगीत और ध्वन्यात्मकता आदि के नए-नए प्रयोगों के लिए विख्यात है। आपका जन्म ओड़िशा के नरगोड़ा (खुर्दा) में 9 दिसंबर 1954 को हुआ। संप्रति कटक के कल्याणी नगर में रह रहे हैं ।ओड़िया भाषा और साहित्य में प्रोफेसर का कार्य करने के पश्चात आपने मीडिया के क्षेत्र में कदम रखें । सन 1980 से 1995 के दौरान ओड़िया दैनिक 'प्रगतिवादी', 'संवाद', 'प्रजातंत्र' एवं रविवारीय रहस्य रोमांच जैसे महत्वपूर्ण समाचार पत्रों मे साहित्य और फीचर लेखन में नए नए ट्रेंड स्थापित किए। सन 1995 के पश्चात आपने 'कहानी' एवं 'अक्षर' जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशन गृहों की स्थापना की। जिसमें कहानी प्रकाशन गृह को 2003 में ओडिशा राज्य का सर्वश्रेष्ठ प्रकाशन गृह के रूप में ग्यारहवां भुवनेश्वर पुस्तक मेला पुरस्कार प्राप्त हुआ । *कृतियाँ :-* अभी तक आपके 13 काव्य- संकलन प्रकाशित हो चुके हैं। जिनमें 'कालिर कविता' (1976), 'क्रौंच मिथुन' (1982), 'धैर्यर शायरी' (2002), 'भारतवर्ष' (2003), 'नील निर्वाण' (2003), 'सर्ग समग्र' (2004), 'तृष्णा तर्पण' (2004) 'चतुर्दशीर चंद्र' (2005), 'उत्तर मेघ' (2006), 'चित्र प्रतिमा' (2007), 'शीत शीर्षक' (2008), ' चर्या चयन' (2009), 'चारण चर्या' (2011), 'काव्य-पुरुष' मुख्य है। इसके अतिरिक्त, 'पदावली:पत्रावली' में चयनित कविताएं एवं पाठकों के विचार संकलित है। लेखन की अन्य विधाओं मे 'मैं फूलन कहूछि' ( बैंडिट क्वीन फूलन देवी की जीवनी पर आधारित रेखाचित्र), गद्य (साहित्यिक आलोचना,रिपोतार्ज, लघु कहानियां एवं पत्रकारिता पर आधारित आलेखों का संग्रह), पद्म पुराण (काव्य-संग्रह), रुत- निरुत (काव्य-संग्रह) प्रकाशनाधीन है। *संपादन* :- रेनेसा (1980), (त्रैमासिक पत्रिका), सतीर्थ साहित्य-काव्य कविता (1981) ( सतरह समकालीन युवा ओड़िया कवियों की कविताओं का संपादन), सतीर्थ (1982), (त्रैमासिक पत्रिका), 'जन्ह राति' (2004) (कभी-कभी), 'सममुख्य' (पाक्षिक पत्रिका) आदि का संपादन कार्य भी किया । *सम्मान एवं संवर्धना:-* सन 1969 में गांधी वेटरनरी ऑल इंडिया अवार्ड फॉर स्टूडेंट, लिटरेरी चैंपियन इन कॉलेज कैरियर (1971-72), सुलेख शॉर्ट स्टोरी अवॉर्ड (1972), सन 1997 में महावीर सांस्कृतिक अनुष्ठान, कालाहांडी द्वारा सर्वश्रेष्ठ आलेख लेखक पुरस्कार, उत्कल साहित्य समाज कटक द्वारा गंगाधर कविता सम्मान (2005), प्रजातंत्र प्रचार समिति, कटक द्वारा झंकार कविता सम्मान (2008), 2006 में 'भारतवर्ष' कविता संकलन पर ओड़िशा साहित्य अकादमी का पुरस्कार , सन 2009 में गोकर्णी पुरस्कार, सन 2010 में कादंबिनी कविता पुरस्कार प्राप्त हुआ। आपकी पत्नी डॉ विजया लक्ष्मी बलियार सिंह पेडिएक्ट्रीशियन (शिशु विशेषज्ञ चिकित्सक) होने के साथ-साथ एक प्रतिष्ठित उपन्यासकार एवं कहानीकार भी है।